अल्लाह तआला पर ईमान

इस्लाम की रूह, ईमान का सबसे बड़ा स्तंभ

यह कायनात एक बड़ी खुली किताब की तरह है, जिसका हर पन्ना अल्लाह तआला के वुजूद की गवाही देता है।
चमकते तारे, बहते दरिया, हरी-भरी वादियाँ और चहचहाते परिंदे — सब एक ज़बान में पुकारते हैं कि इन सबका कोई ना कोई खालिक और मालिक है, जो इनका इंतज़ाम और देखभाल कर रहा है।

▪️ कायनात का हर जर्रा अल्लाह के वुजूद की गवाही देता है ▪️

जब हम कोई खूबसूरत महल देखते हैं, तो फौरन समझ जाते हैं कि इसे किसी माहिर इंजीनियर ने बनाया होगा।
तो फिर ये फैली हुई कायनात, आसमान और ज़मीन, समंदर और पहाड़ — क्या ये सब खुद ब खुद बन सकते हैं?
हरगिज़ नहीं! इनका एक बनाने वाला ज़रूर है, और वो सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तआला हैं।

कुरान कहता है:
“क्या ये बिना किसी बनाने वाले के पैदा हो गए या खुद ही अपने बनाने वाले हैं?”
(अत्-तूर: 35)


कायनात का नियम और व्यवस्था

  • क्या कभी ऐसा हुआ कि सूरज पूरब की जगह पश्चिम से निकला हो?
  • क्या चाँद अपनी जगह से हट गया हो?
  • नहीं! हर चीज़ एक तयशुदा सिस्टम के मुताबिक चल रही है।

ये सब अल्लाह तआला की कुदरत का खुला सबूत है।

कुरान कहता है:
“बेशक आसमानों और ज़मीन की तखलीक़ में और रात-दिन के बदलने में समझ वालों के लिए निशानियाँ हैं।”
(आल इमरान: 190)


इंसानी ज़मीर की गवाही
जब इंसान सच बोलता है, तो दिल में सुकून पाता है।
और जब झूठ बोलता है, तो बेचैनी महसूस करता है।

ये एहसास किसने दिया?
ये अंदर का रोशनी अल्लाह तआला ने ही दी है, जिससे इंसान अच्छाई और बुराई में फर्क कर सके।

कुरान कहता है:
“और नफ़्स की कसम, और जिसे (अल्लाह ने) बनाया। फिर उसमें उसकी बुराई और परहेज़गारी की पहचान डाली।”
(अश-शम्स: 7-8)


तौहीद (एकेश्वरवाद)

कायनात का ये बेहतरीन सिस्टम, ज़मीन-आसमान का तालमेल, और कुदरत की शानदार तरतीब एक ही सच की तरफ इशारा करती है —
कि ये सब एक ही खुदा की तखलीक है।

अगर दुनिया में कई खुदा होते, तो ये सिस्टम बिखर जाता।

कुरान कहता है:
“अगर आसमान और ज़मीन में अल्लाह के सिवा और खुदा होते, तो ज़रूर दोनों तबाह हो जाते।”
(अंबिया: 22)

जैसे हर शानदार पेंटिंग एक ही पेंटर की होती है, वैसे ही ये कायनात भी सिर्फ एक ही खुदा की बनाई हुई है।

दिल की दुआ, रुह की तड़प, और हर सजदा इस बात का गवाह है कि माबूद सिर्फ एक है — और वही हाकिम है।


तौहीद की परिभाषा

“तौहीद” अरबी शब्द है, जिसका मतलब है “किसी को एक मानना”।

इस्लामी परिभाषा:
शरीअत में तौहीद से मतलब है — अल्लाह तआला को उनकी ज़ात, सिफात (गुण), और कामों में एक और बेमिसाल मानना, और किसी को भी उनका शरीक न ठहराना।


तौहीद के तीन मुख्य प्रकार:

तौहीद-ए-ज़ात (अल्लाह की ज़ात में एकता):
अल्लाह तआला की ज़ात में कोई शरीक नहीं। न उनकी कोई शुरुआत है, न कोई अंत, और न ही कोई उनके जैसा है।

“उसके जैसा कोई नहीं।”
(अश-शूरा: 11)


तौहीद-ए-सिफात (अल्लाह की गुणों में एकता):
अल्लाह की हर खूबी में वह अकेले हैं।
उनके नाम हैं — अस्मा-उल-हुस्ना (सुंदर नाम) — जिनसे हमें उन्हें पुकारना चाहिए।

“और अल्लाह के लिए हैं सबसे अच्छे नाम, उन्हें इन्हीं नामों से पुकारो।”
(अल-आराफ: 180)

अल्लाह तआला ही:

  • खालिक (सृष्टिकर्ता): “अल्लाह हर चीज़ के खालिक हैं।” (अज़-ज़ुमर: 62)
  • राज़िक (रोज़ी देने वाले): “कोई ज़िंदा चीज़ ज़मीन में ऐसी नहीं, जिसका रिज़्क अल्लाह के ज़िम्मे न हो।” (हूद: 6)
  • पानी बरसाने वाले: “क्या तुमने वो पानी देखा जो तुम पीते हो? क्या तुमने उसे उतारा या हम?” (वाकिया: 68-69)
  • जान देने और लेने वाले: “जिसने मुझे पैदा किया, वही मुझे राह दिखाता है… वही मुझे खाना देता है, पानी पिलाता है, और जब मैं बीमार होता हूँ तो वही मुझे शिफा देता है।”
    (शोअरा: 78-81)

तौहीद-ए-इबादत (इबादत में एकता):
इबादत सिर्फ अल्लाह का हक है।
दुआ, सजदा, डर, उम्मीद — सब सिर्फ अल्लाह से होनी चाहिए।

कुरान कहता है:
“तो जो अपने रब से मिलने की उम्मीद रखता है, वो नेक काम करे और किसी को भी इबादत में शरीक न करे।”
(कहफ: 110)

“अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक मत ठहराओ।”
(अन-निसा: 36)

“हम आप ही की इबादत करते हैं और आप ही से मदद मांगते हैं।”
(अल-फातिहा: 5)


तौहीद पर यकीन के इनाम:

सुकून और इत्मिनान:
जो अल्लाह पर ईमान रखता है, वो कभी बेचैन नहीं होता।
“खबरदार! अल्लाह की याद से दिलों को सुकून मिलता है।”
(अर-रअद: 28)

अल्लाह पर भरोसा:
नबी करीम ﷺ ने फरमाया:
“अगर तुम अल्लाह पर ऐसा भरोसा करो जैसा करने का हक है, तो वो तुम्हें वैसे ही रिज़्क देगा जैसे परिंदों को देता है।”
(तिर्मिज़ी, इब्न माजा)

आख़िरत की कामयाबी:
ये दुनिया फानी है, लेकिन जन्नत हमेशा की है।
जो अल्लाह पर ईमान रखता है, वही जन्नत का हक़दार है।


तौहीद का नूर — असली आज़ादी का एहसास

जब इंसान अपने रब को एक मानता है और पूरी तरह भरोसा करता है, तो उसका दिल रौशन हो जाता है।
वो हर फैसले को अल्लाह की हिकमत समझ कर कुबूल करता है।

यही यकीन उसे ज़ालिम ताक़तों के सामने खड़ा कर देता है।
उसे किसी का डर नहीं रहता, क्योंकि वो जान चुका होता है कि असली ताक़त सिर्फ उसके रब के पास है।

यही तवक्कुल (भरोसा) था:

  • जिससे हज़रत इब्राहीम अ. आग में कूद गए,
  • हज़रत मूसा अ. ने फिरऔन के ज़ुल्म का सामना किया,
  • और नबी करीम ﷺ ने पूरी कायनात को हिला देने वाली तब्दीली ला दी।

हक़ीक़ी आज़ादी वही है
जब इंसान हर डर और मसलहत से आज़ाद होकर सिर्फ अपने रब पर भरोसा करे और हक़ की राह पर बेधड़क चलता रहे।

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