तिलावत : अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है, इसका मतलब है पीछे चलना, इत्बा करना।
क़ुरआन करीम के मआनी पर मुश्तमिल म’रूफ़ किताब:
मुफरदातुल क़ुरआन में तिलावत के मअनी इसी तरह हैं:
التِّلَاوَةُ تَخْتَصُّ بِاتِّبَاعِ كُتُبِ اللَّهِ الْمُنَزَّلَةِ
“अल्लाह तआला की तरफ़ से नाज़िल की गई किताबों की इत्बा को तिलावत कहा जाता है।”
(मुफरदातुल क़ुरआन, लिल-अस्फहानी)
अरबी ज़बान में क़िराअत और तिलावत में थोड़ा सा फर्क है।
क़िराअत यानी पढ़ना और पढ़ने का मतलब, समझकर पढ़ना ही होता है।
जबकि
तिलावत, क़ुरआन करीम को पढ़ने, समझने, ग़ौर व तदब्बुर करने और उसके अहकामात व मनहियात पर अमल करने को कहते हैं।
अल्लाह सुब्हानहु व तआला क़ुरआन करीम में चाँद के मुतअल्लिक़ इर्शाद फ़रमाते हैं:
“और चाँद जब सूरज के पीछे आए” (अश्शम्स)
इस आयत में चाँद की हरकत के लिए “तला” का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है, जो तिलावत के ही क़बीले से है।
दूसरी जगह इर्शाद है:
الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَتْلُونَهُ حَقَّ تِلَاوَتِهِ أُولَـٰئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِ
(अलबक़रह)
“जिन लोगों को हमने किताब दी है, वो उसकी उसी तरह तिलावत करते हैं, जिस तरह तिलावत करने का हक़ है,
ये लोग इस (किताब) पर ईमान रखते हैं……।”
यानी जो लोग क़ुरआन करीम पर ईमान रखते हैं वो इसकी तिलावत का हक़ अदा करते हैं।
मुफस्सिरीन किराम इस आयत के ज़ैल में लिखते हैं:
أي: يَتَّبِعُونَهُ حَقَّ اتِّبَاعِهِ، وَالتِّلَاوَةُ: الِاتِّبَاعُ، فَيُحِلُّونَ حَلَالَهُ، وَيُحَرِّمُونَ حَرَامَهُ، وَيَعْمَلُونَ بِمُحْكَمِهِ، وَيُؤْمِنُونَ بِمُتَشَابِهِهِ
(तफ्सीरुस सअदी
लिश्शैख अब्दुर्रहमान बिन नासिर अस्सअदी रहिमहुल्लाह)
तिलावत का हक़ अदा करने का मतलब यह है कि वो क़ुरआन करीम का इत्बा करते हैं, जैसे कि इत्बा करने का हक़ है।
तिलावत दर असल इत्बा है, वो क़ुरआन करीम के हलाल को हलाल और हराम को हराम समझते हैं, उसके मुहकम पर अमल करते हैं और मुतशाबिह पर ईमान रखते हैं।
सूरह साद में अल्लाह तआला, क़ुरआन करीम का मक़्सद-ए-नुज़ूल बयान करते हुए इर्शाद फ़रमाते हैं:
كِتٰبٌ اَنْزَلْنٰهُ اِلَیْكَ مُبٰرَكٌ لِّیَدَّبَّرُوْۤا اٰیٰتِهٖ وَ لِیَتَذَكَّرَ اُولُوا الْاَلْبَابِ ۔
(साद २९)
यह क़ुरआन करीम एक मुबारक किताब है, जो हमने तुम्हारी तरफ़ नाज़िल की है, ताकि लोग इसकी आयतों में ग़ौर व फिक्र करें और अक़्लमंद नसीहत हासिल करें।
इस क़द्र वाज़ेह इर्शाद के बाद कि क़ुरआन करीम नाज़िल ही हुआ है, समझने, ग़ौर व तदब्बुर करने और नसीहत हासिल करने के लिए, इस सवाल की गुञ्जाइश ही बाकी नहीं रहती कि क़ुरआन करीम समझना ज़रूरी है या नहीं?
नबी करीम ﷺ तिलावत करने वालों की जज़ा बयान करते हुए इर्शाद फ़रमाते हैं:
مَنْ قَرَأَ الْقُرْآنَ وَعَمِلَ بِمَا فِيهِ أُلْبِسَ وَالِدَاهُ تَاجًا يَوْمَ الْقِيَامَةِ، ضَوْءُهُ أَحْسَنُ مِنْ ضَوْءِ الشَّمْسِ فِي بُيُوتِ الدُّنْيَا لَوْ كَانَتْ فِيكُمْ، فَمَا ظَنُّكُمْ بِالَّذِي عَمِلَ بِهَذَا؟
(रवाहु अबू दाऊद)
जिसने क़ुरआन करीम पढ़ा और जो कुछ उसमें है उस पर अमल किया, क़ियामत के दिन उसके वालिदैन को सूरज से ज़्यादा ख़ूबसूरत ताज पहनाया जाएगा।
इसी तरह, हिफ़्ज़े क़ुरआन करीम के बारे में गुफ़्तगू करते हुए आप ﷺ इर्शाद फ़रमाते हैं:
مَنْ قَرَأَ الْقُرْآنَ وَاسْتَظْهَرَهُ فَأَحَلَّ حَلَالَهُ وَحَرَّمَ حَرَامَهُ أَدْخَلَهُ اللَّهُ بِهِ الْجَنَّةَ وَشَفَّعَهُ فِي عَشَرَةٍ مِنْ أَهْلِ بَيْتِهِ كُلِّهِمْ وَجَبَتْ لَهُمُ النَّارُ.
(रवाहुत तिर्मिज़ी)
जिसने क़ुरआन करीम पढ़ा और उसे हिफ़्ज़ किया फिर उसके हलाल को हलाल और हराम को हराम जाना, अल्लाह तआला इस बुनियाद पर उसे जन्नत में दाख़िल फ़रमाएंगे और वह अपने घर वालों में से दस ऐसे लोगों के लिए सिफ़ारिश करेगा जिन पर (ईमान के बावजूद) जहन्नम लाज़िम हो चुकी होगी।
अहादीस के अल्फ़ाज़ पर ग़ौर कीजिए:
जिन अहादीस में भी क़ुरआन करीम पढ़ने / हिफ़्ज़ करने की फ़ज़ीलतें वारिद हुई हैं, उनमें क़ुरआन करीम के अहकामात पर अमल करने और उसके हलाल को हलाल और हराम को हराम जानने का भी ज़िक्र है।
क्या क़ुरआन करीम के अहकामात पर अमल करना और उसके बयान करदा हलाल व हराम को समझना, बिना क़ुरआन करीम को समझे हुए मुमकिन है ???
इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह ने एक हदीस का तरजुमतुल बाब इस तरह बांधा किया है:
باب قِرَاءَةِ الْفَاجِرِ وَالْمُنَافِقِ، وَأَصْوَاتُهُمْ وَتِلاَوَتُهُمْ لاَ تُجَاوِزُ حَنَاجِرَهُمْ (बुख़ारी)
फ़ासिक़ व फाजिर और मुनाफ़िक़ की क़िराअत का बयान, जिनकी तिलावत उनके हलक के नीचे नहीं उतरती है।
عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ – रज़ियल्लाहु अन्हु – عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
“يَخْرُجُ نَاسٌ مِنْ قِبَلِ الْمَشْرِقِ وَيَقْرَءُونَ الْقُرْآنَ لاَ يُجَاوِزُ تَرَاقِيَهُمْ، يَمْرُقُونَ مِنَ الدِّينِ كَمَا يَمْرُقُ السَّهْمُ مِنَ الرَّمِيَّةِ، ثُمَّ لاَ يَعُودُونَ فِيهِ حَتَّى يَعُودَ السَّهْمُ إِلَى فُوقِهِ”
قِيلَ مَا سِيمَاهُمْ؟ قَالَ: “سِيمَاهُمُ التَّحْلِيقُ” أَوْ قَالَ “التَّسْبِيدُ”।
हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि नबी करीम ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया:
“मश्रिक़ की सिम्त से कुछ लोग निकलेंगे, जो क़ुरआन करीम तो पढ़ेंगे मगर वह उनके हलक से नीचे नहीं उतरेगा। वो दीन से इस तरह निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार को चीर कर पार निकल जाता है, और फिर वो दीन में वापस नहीं आएंगे, जैसे तीर कमान में वापस नहीं लौटता।”
सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने सवाल किया: या रसूलल्लाह ﷺ, उनकी पहचान क्या होगी?
आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया:
“सर मुंडाना।”
वजह ज़ाहिर है जिस दीन की अस्ल किताब, क़ुरआन करीम है, उसी को पढ़ने और समझने से अगर दूरी हो, तो दीन में बाक़ी रहने का क्या सवाल पैदा होता है?
हज़रत ज़ुल ख़ुवैसिरा का वाक़िआ बुख़ारी शरीफ़ की एक तवील रिवायत में नक़्ल हुआ है:
فَقَامَ إِلَيْهِ رَجُلٌ أَحْدَبُ، الزُّرَيْنِ، غَائِرُ الْعَيْنَيْنِ، نَاتِئُ الْجَبِينِ، كَثِيرُ اللِّحْيَةِ، مُشَرِّطُ الرَّأْسِ، مَحْلُوقٌ، فَقَالَ: يَا مُحَمَّدُ اتَّقِ اللَّهَ!
आप ﷺ माले ग़नीमत तक़सीम फ़रमा रहे थे कि एक आदमी खड़ा हुआ, जिसकी शक्लो सूरत इस तरह थी :
(उसकी दाढ़ी बहुत ज़्यादा थी, आंखें अंदर को धंसी हुई थीं, माथा उभरा हुआ था, सिर मुंडा हुआ था और गर्दन पतली थी।)
उसने नबी करीम ﷺ से कहा: “या मुहम्मद! अल्लाह से डरिए!”
आप ﷺ ने फ़रमाया:
“अगर मैं अल्लाह से नहीं डरता तो कौन डरता?”
(रावी बयान करते हैं)
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया: या रसूलल्लाह! मुझे इजाज़त दीजिए, मैं इस मुनाफ़िक़ की गर्दन उड़ा दूं।
आप ﷺ ने फ़रमाया:
“रहने दो, ताकि लोग यह न कहें कि मुहम्मद ﷺ अपने साथियों को क़त्ल कराते हैं।”
इसके बाद आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया:
“इस आदमी की नस्ल से ऐसे लोग पैदा होंगे, जो क़ुरआन करीम तो पढ़ेंगे लेकिन वह उनके हलक से नीचे नहीं उतरेगा। वो दीन से इस तरह निकल जाएंगे जैसे तीर, शिकार के जिस्म को चीरता हुआ निकल जाता है। वो इस दीन से इस तरह निकल जाएंगे जैसे तीर, शिकार से। अगर मैं उनको पा जाऊं तो क़ौम-ए-आद की तरह एक एक को क़त्ल कर दूं।”
(बुख़ारी शरीफ़)
नबी करीम ﷺ ने इस हद तक इरशाद फ़रमाया कि अगर मैं उन्हें पा जाऊं तो क़ौम-ए-आद की तरह एक एक को क़त्ल कर दूं।
क्योंकि यह लोग क़ुरआन करीम की तिलावत तो करते हैं मगर समझते नहीं हैं, और उसके नाम पर गुमराही फैलाते हैं।
अब सवाल यह है कि हम क़ुरआन करीम को क्या समझते हैं?
क्या हमारे लिए यह किताब-ए-हिदायत है, जिसकी तिलावत हम हक़ अदा करते हुए करते हैं?
या फिर यह सिर्फ़ स्कूल / मदरसे में नौनिहालों को पढ़ाने की चीज़ है?
या फिर यह सिर्फ़ ताजियत, तीज़े, चालीसवे में सोवाब के लिए पढ़ी जाती है?
आज हमारी हालत यह है कि हम क़ुरआन करीम को अपने लिए किताब-ए-हिदायत समझते ही नहीं हैं।
हमने इसे सिर्फ़ सोवाब की किताब बना लिया है, जिसकी तिलावत हम ख़ास ख़ास मौक़ों पर करते हैं।
जबकि यह किताब तो उस क़ौम के लिए ज़िंदा किताब बनती है, जो उस पर अमल करे, उससे रास्ता हासिल करे, उसके हुक्मों को अपनाए।
वरना यह किताब बनी इसराईल के उलमा की तरह, हमारे सरों पर बोझ बन जाएगी, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
مَثَلُ الَّذِينَ حُمِّلُوا التَّوْرَاةَ ثُمَّ لَمْ يَحْمِلُوهَا كَمَثَلِ الْحِمَارِ يَحْمِلُ أَسْفَارًا ۚ
(अल-जुमुअः)
“उन लोगों की मिसाल जिन पर तौरेत का बार डाला गया, फिर उन्होंने उसे न उठाया, गधे जैसी है जो किताबें लादे हुए हो।”
क्या यही मिसाल आज हमारे ऊपर भी सादिक़ नहीं आती?
हमने अपने बच्चों को हाफ़िज़ तो बना दिया मगर उसके बाद उन्हें डाक्टर, इंजीनियर, मुलाज़िम, ताजिर तो बना दिया मगर क़ुरआन करीम से उनका राबिता टूट गया।
न उन्हें समझने की फुर्सत मिली, न उस पर अमल करने की तौफ़ीक़।
नतीजा यह हुआ कि आज हम क़ुरआन करीम तो पढ़ते हैं मगर हिदायत नहीं पाते, और यही अल्लाह तआला का इर्शाद है:
وَنُنَزِّلُ مِنَ الْقُرْاٰنِ مَا هُوَ شِفَآءٌ وَّرَحْمَةٌ لِّلْمُؤْمِنِيْنَ وَلَا يَزِيْدُ الظّٰلِمِيْنَ اِلَّا خَسَارًا۔
(अल-इसरा)
“हम क़ुरआन करीम में वही चीज़ नाज़िल करते हैं जो मोमिनों के लिए शिफ़ा और रहमत होती है, और ज़ालिमों के लिए यह और ज़्यादा नुक़्सान बढ़ा देती है।”
तो आइए!
हम आज से यह अहद करें कि हम क़ुरआन करीम की तिलावत सिर्फ़ लफ़्ज़ों तक नहीं रखेंगे, बल्कि उसे समझेंगे, उस पर अमल करेंगे, और उसकी रोशनी में अपनी ज़िंदगी को ढालेंगे।
क्योंकि यही रोशनी है जो हमें अंधेरों से निकालकर, सीधा रास्ता दिखा सकती है।